बचपन का रेल का सफ़र

बचपन का रेल का सफ़र,
आज भी है याद,
खिड़की के पास बैठने को झगड़ना,
घंटों बाहर स्टेशन के नज़ारे देखना,
हरे - भरे खेतों का मनमोहक नज़ारा,
खंभों की ओझल होती कतारें,
हाथ - मुंह हो जाते थे काले,
फिर भी खिड़की वाली जगह,
लगती थी सबसे प्यारी ।

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